जब विश्वास हो, तो प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है..........

 जो तुम्हारे हिस्से का है, वह तुम तक बहकर आएगा ही, भले ही पूरी दुनिया उसके खिलाफ हो। और जो तुम्हारे हिस्से का नहीं है, वह हाथ में आकर भी छूट जाएगा।

सुबह की शुरुआत हर घर में लगभग एक जैसी ही होती है—चाय की चुस्कियां, रसोई की खटपट और नाश्ते की तैयारी। मेरे घर में भी दिन की शुरुआत कुछ ऐसी ही होती है।

हर रोज़ जब मैं तवे पर रोटियां सेकती हूँ, तो एक नियम हमेशा निभाती हूँ—पहली रोटी गौ माता के लिए और आखिरी रोटी हमारे बेजुबान दोस्तों यानी कुत्तों के लिए।

यह केवल एक आदत नहीं, बल्कि मेरी सुबह की प्रार्थना का एक हिस्सा बन चुका है।

रोज़ की तरह आज भी मैं आखिरी रोटी लेकर अपने मुख्य द्वार की तरफ बढ़ी। हमारी कॉलोनी में काफी सारे आवारा कुत्ते (Street dogs) रहते हैं। जैसे ही मैं दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलती हूँ, खाने की गंध पाकर 4-5 कुत्ते दौड़ते हुए आ जाते हैं।

उन सबमें एक अजीब सी हड़बड़ी होती है। वे एक-दूसरे पर भौंकने लगते हैं, झपटने लगते हैं और इस बात से डरते हैं कि कहीं दूसरा उनका खाना न छीन ले।

लेकिन आज मेरा ध्यान एक खास कुत्ते पर गया।

वह उन लड़ते हुए कुत्तों के बीच में बिल्कुल चुपचाप खड़ा था। उसके चेहरे पर न कोई हड़बड़ी थी, न ही छीनने की कोई कोशिश।

हमारी बाउंड्री वॉल पर एक छोटा सा हिस्सा है, जहाँ वह आसानी से चढ़ जाता है—यह उसकी रोज़ की जगह बन चुकी है। जहाँ बाकी कुत्ते नीचे खाने के लिए आपस में उलझ रहे थे, वह चुपचाप उन सबको पीछे छोड़ता हुआ दीवार पर चढ़कर बैठ गया।

उसे पक्का भरोसा था। उसे पता था कि उसकी कटोरी में उसका खाना वहीं आएगा।उस कुत्ते को शांति से अपनी जगह जाकर बैठते देखना मेरे लिए सिर्फ एक दृश्य नहीं था, यह जीवन का एक बहुत बड़ा दर्शन था।

                                                   इस घटना ने मुझे क्या सिखाया?

1. कमी का डर बनाम सुरक्षा का अहसास (Scarcity vs. Security)

नीचे लड़ रहे बाकी कुत्ते 'कमी की मानसिक स्थिति' (Scarcity Mindset) में थे। उन्हें डर था कि अगर वे नहीं लड़े, तो भूखे रह जाएंगे। लेकिन वह एक कुत्ता 'सुरक्षा और अनुभव' के अहसास में था। उसे पता था कि उसका ध्यान रखने वाला कोई है।

2. जो आपका है, उसके लिए लड़ना नहीं पड़ता

हम इंसान भी तो अक्सर नीचे लड़ रहे उन कुत्तों की तरह ही व्यवहार करने लगते हैं ना?

  • समाज में दूसरों से आगे निकलने की दौड़,

  • यह डर कि कहीं कोई हमारा हक न मार ले,

  • और हर समय एक अजीब सी अशांति।

लेकिन उस बेजुबान ने मुझे याद दिलाया कि जब आपको अपनी नियति और ईश्वर (या ब्रह्मांड) पर अटूट भरोसा होता है, तो आप दुनिया के शोर से विचलित होना बंद कर देते हैं।

"जिस दिन आप समझ जाते हैं कि जो आपके लिए बना है वह आपको मिलकर ही रहेगा, उस दिन से आपकी ज़िंदगी से बेवजह की प्रतिस्पर्धा और तनाव हमेशा के लिए गायब हो जाते हैं।"

अंतिम विचार.............

जब मैं खाना उसकी कटोरी में रखकर अंदर आई, तो मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी। एक छोटी सी सुबह की दिनचर्या ने मुझे आध्यात्म का सबसे गहरा पाठ पढ़ा दिया था:

शांति से अपनी जगह पर बने रहिए, मेहनत कीजिए और भरोसा रखिए—आपका हिस्सा किसी और के पास कभी नहीं जा सकता। 

🧘‍♀️ आत्मचिंतन वाला सवाल??


क्या हम भी आज के इस शोर-शराबे और होड़ भरी ज़िंदगी में उस बेजुबान की तरह 'अटूट विश्वास और शांति' चुन सकते हैं? आपको इस कहानी से क्या सीख मिली, मुझे कमेंट में बताइए।

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