बैकुंठ में जो स्थान यशोदा को मिला, वही पूतना को क्यों? जानिए पुराणों का यह अद्भुत रहस्य!
"क्या ईश्वर सिर्फ भक्तों का उद्धार करते हैं, या फिर उन्हें मारने आए शत्रुओं का भी? हिंदू धर्मग्रंथों में एक ऐसी कथा दर्ज है जहाँ एक हत्यारिन राक्षसी बाल-कृष्ण को विष पिलाने आती है, लेकिन बदले में भगवान उसे मुक्त करके बैकुंठ में माँ का स्थान दे देते हैं! आखिर क्या था उस राक्षसी के पूर्व जन्म का वो रहस्य, जिसने भगवान कृष्ण को भी 'विवश' कर दिया? आइए जानते हैं..."🙏
जब भी हम श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं को याद करते हैं, तो 'पूतना वध' की घटना सबसे पहले मन में आती है। एक राक्षसी, जो नवजात शिशुओं की जान लेती थी और बाल-कृष्ण को भी अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर मारने आई थी—उसे भगवान श्री कृष्ण ने मारने के बाद परम धाम (मुक्ति) दे दिया!
सवाल उठता है कि एक हत्यारिन राक्षसी पर भगवान इतने दयालु क्यों हुए?
इसका जवाब छिपा है श्रीमद्भागवत पुराण और गर्ग संहिता में वर्णित पूतना के पूर्व जन्म की कहानी में। आइए जानते हैं राजा बलि की पुत्री रत्नमाला की वह कथा, जिसने उसे पूतना बनाया और अंततः मोक्ष दिलाया।
.........................पूर्व जन्म: राजा बलि की सुंदर पुत्री 'रत्नमाला'..............................
बात सत्ययुग की है। दैत्यराज बलि (भक्त प्रह्लाद के पौत्र) अत्यंत दानी राजा थे। उनकी एक बहुत ही रूपवती और विशालकाय पुत्री थी, जिसका नाम रत्नमाला था।
जब भगवान विष्णु ने देवताओं का अधिकार वापस दिलाने के लिए वामन अवतार लिया, तब वे एक अत्यंत सुंदर, छोटे और तेजस्वी ब्राह्मण बालक (बटुक) के रूप में राजा बलि के यज्ञ-मंडप में पधारे
एक ही पल में जागे दो विपरीत भाव (ममता और क्रोध)
भगवान वामन के उस मनमोहक रूप को देखकर रत्नमाला का मन ठहर सा गया। उसी समय उसके मन में दो अलग-अलग भावनाएं उत्पन्न हुईं:
पहला भाव (मातृत्व की इच्छा):
वामन देव के बाल-रूप को देखकर रत्नमाला का हृदय ममता से भर गया। उसने मन ही मन सोचा— "काश! ऐसा अत्यंत सुंदर बालक मेरा पुत्र होता, तो मैं इसे प्रेम से अपना दूध पिलाती और लालन-पालन करती।"
अंतर्यामी भगवान ने उसके इस वात्सल्य भाव को स्वीकार कर लिया।
दूसरा भाव (विष देकर मारने की इच्छा):
लेकिन इसके ठीक बाद, जब वामन देव ने छल से राजा बलि का सब कुछ नाप लिया और उन्हें बंदी बना लिया, तो रत्नमाला क्रोध से भर गई। पिता का अपमान देखकर उसकी ममता अचानक नफरत में बदल गई। उसने मन में सोचा— "यह बालक अत्यंत कपटी है! अगर यह मेरा पुत्र होता, तो मैं इसे दूध में विष मिलाकर पिला देती और मार डालती।"
भगवान ने उसके इस क्रोधयुक्त विचार को भी 'तथास्तु' कह दिया।
3. कृष्ण अवतार और पूतना का आगमन
समय का पहिया घुमा और द्वापर युग में भगवान श्री हरि ने श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिया। पूर्व जन्म की वही रत्नमाला, कंस की राक्षसी सहयोगी 'पूतना' के रूप में जन्मी।
कंस के कहने पर पूतना गोकुल में नवजात बच्चों को मारने पहुँची। उसने सुंदर रूप धारण किया और अपने स्तनों पर जहरीला कालकूट विष लगा लिया, ताकि बालक की तुरंत मृत्यु हो जाए।
4. श्री कृष्ण ने कैसे पूरी कीं दोनों इच्छाएं?
जब पूतना ने नंदबाबा के घर में प्रवेश किया और बाल-कृष्ण को अपनी गोद में उठाया, तो भगवान मुस्कुरा दिए। वे जानते थे कि यह वही रत्नमाला है जिसकी दो अधूरी इच्छाएं पूरी होनी बाकी हैं:
दूध पिलाने की इच्छा: पूतना ने जैसे ही कृष्ण को स्तनपान कराना शुरू किया, उसकी पहली इच्छा पूरी हो गई।
विष देकर प्रहार करने की इच्छा: उसने विष लगाया था, जिससे उसकी दूसरी इच्छा भी पूरी हो गई।
.................................मृत्यु नहीं, परम मुक्ति......................................
भगवान कृष्ण ने दूध पीते-पीते पूतना के प्राण ही खींच लिए। पूतना दर्द से चीखती हुई अपने असली राक्षसी रूप में आ गई और वहीं ढेर हो गई।
यहाँ सबसे अद्भुत बात यह हुई कि भगवान ने पूतना के विष देने के पाप को पूरी तरह भुला दिया। उन्होंने केवल इस बात को ध्यान में रखा कि— "इसने मुझे माता की तरह अपना दूध पिलाया है।" भगवान ने उसे वही स्थान दिया जो बैकुंठ लोक में एक धात्री (माता/धाय) को मिलता है।भगवान श्री कृष्ण को 'भावग्राही जनार्दन' कहा जाता है—यानी वे इंसान के बाहरी कर्मों से ज्यादा उसके मन के 'भाव' को देखते हैं। पूतना बुराई के भाव से आई थी, लेकिन उसने अनजाने में ही सही, भगवान को माता का सुख दिया।
यह कथा हमें सिखाती है कि यदि कोई सच्चे मन से या अनजाने में भी ईश्वर की शरण में जाता है, तो भगवान उसके सारे पाप क्षमा करके उसका उद्धार कर देते हैं।
ईश्वर की असीम कृपा और क्षमा
अक्सर हम सोचते हैं कि हमारे पापों या गलतियों के कारण ईश्वर हमसे दूर हो गए हैं। लेकिन पूतना की यह कथा सिखाती है कि प्रभु श्री कृष्ण इतने दयालु हैं कि वे शत्रु के रूप में आए पापियों को भी क्षमा करके बैकुंठ में स्थान दे सकते हैं!चाहे आपने जीवन में कितनी भी गलतियाँ की हों, यदि आज आप सच्चे मन से प्रभु की शरण में जाते हैं, तो उनका द्वार आपके लिए हमेशा खुला है। भगवान सजा देने के लिए नहीं, बल्कि हमारा उद्धार करने के लिए बैठे हैं।
आपको यह पौराणिक कथा कैसी लगी? हमें कमेंट करके जरूर बताएं और इसे अपने परिजनों के साथ शेयर करना न भूलें!
Manu..........
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