जब वर्षों बाद कुरुक्षेत्र में मिले श्रीकृष्ण और यशोदा माँ एक भावुक पुनर्मिलन की अमर कथा
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| यशोदा माँ कान्हा को माखन खिलाते हुए |
ब्रज की गलियों में एक समय ऐसा था जब भोर की पहली किरण के साथ यशोदा की छाछ बिलोने की आवाज़ और कान्हा की पैंजनियों की छनक गूंजती थी। गोकुल का हर कोना श्रीकृष्ण की नटखट बाल-लीलाओं का साक्षी था। लेकिन समय का चक्र बदला, और एक दिन ऐसा आया जिसने ब्रज के जीवन को सदा के लिए बदल दिया।
अक्रूर जी का रथ जब कान्हा और बलराम को मथुरा ले जाने के लिए गोकुल आया, तो किसी को अंदाज़ा नहीं था कि ब्रज का यह दुलारा बालक कभी लौटकर उस रूप में गोकुल की गलियों में कदम नहीं रखेगा।
आइए, इस पावन कथा के उस भावुक अध्याय में गहराई से उतरते हैं—जहाँ एक तरफ विरह की अटूट वेदना है, तो दूसरी तरफ वर्षों बाद हुआ वह पावन पुनर्मिलन, जो पत्थर दिल को भी पिघला दे।
भाग 1: मथुरा प्रस्थान और गोकुल का ठहर जाना
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| अक्रूर जी के रथ पर श्रीकृष्ण और बलराम बैठकर मथुरा जा रहे हैं, पीछे दुखी गोपियाँ और यशोदा-नंद बाबा अश्रुपूरित आँखों से निहार रहे हैं। |
श्रीकृष्ण ने जाते समय माता यशोदा के आँसू पोंछे थे और नंद बाबा से कहा था— "बाबा, मैं मामा कंस का निमंत्रण स्वीकार कर केवल कुछ दिनों के लिए मथुरा जा रहा हूँ। कार्य समाप्त होते ही लौट आऊँगा।"
लेकिन वो 'कुछ दिन' कभी नहीं आए।
मथुरा पहुँचकर श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस का वध किया। इसके बाद उग्रसेन को सिंहासन पर बैठाया गया और श्रीकृष्ण-बलराम को Sandipani Muni (सांदीपनि मुनि) के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने जाना पड़ा। इसके बाद जारासंध के आक्रमण, कालयवन का संकट और फिर द्वारका नगरी की स्थापना—धर्म की स्थापना के इन महान दायित्वों ने श्रीकृष्ण को ऐसा बांधा कि वे चाहकर भी माखन चुराने वाले अपने उस पुराने 'कान्हा' के रूप में ब्रज न लौट सके।
भाग 2: विरह की अग्नि में जलता ब्रज माता यशोदा और नंद बाबा की दशा
कान्हा के बिना गोकुल का अस्तित्व ही निष्प्राण हो गया था। नंद बाबा जब मथुरा से अकेले गोकुल लौटे, तो माता यशोदा दौड़ती हुई द्वार पर आईं। उन्होंने रथ में कान्हा को नहीं देखा, तो मूर्छित होकर गिर पड़ीं।
माता यशोदा का वात्सल्य और अश्रु
महाकवि सूरदास जी ने माता यशोदा के इस विरह का जो सजीव चित्रण किया है, वह दुनिया के किसी भी साहित्य में दुर्लभ है। यशोदा जी दिन-रात कान्हा के बिछौने, उनके खिलौनों और उनकी बांसुरी को देखकर रोया करती थीं। वे मथुरा जाने वाले हर पथिक से कान्हा का कुशल-क्षेम पूछती थीं।
सूरदास जी के एक प्रसिद्ध पद में यशोदा जी देवकी के नाम संदेश भेजती हैं👇
"संदेसौ देवकी सौ कहियो।"
"हौं तौ धाइ तिहारे सुत की, कृपा करत ही रहियो॥"
"जदपि टेव तुम जानति तिनकी, तऊ मोहि कहि आवै।"
"प्रात होत मेरे लाड लड़ेतै माखन-रोटी भावै॥"
(अर्थात: हे देवकी! मैं तो तुम्हारे पुत्र की केवल धाय माँ (पालन-पोषण करने वाली) हूँ, उस पर अपनी कृपा बनाए रखना। वैसे तो तुम उसकी आदतें जानती ही होगी, फिर भी माँ का हृदय है, कहे बिना नहीं मानता—सुबह होते ही मेरे दुलारे कान्हा को माखन-रोटी खाने की आदत है, उसका ध्यान रखना।)
यशोदा माता को चिंता थी कि क्या मथुरा के राजसी ठाट-बाट में कान्हा को समय पर माखन मिलता होगा? क्या कोई रात को उसके पैर दबाकर सुलाता होगा? यह एक माँ की निश्चल, निस्वार्थ और अनन्त ममता थी।
नंद बाबा का सन्नाटा
नंद बाबा, जो ब्रज के मुखिया थे, कान्हा के जाने के बाद पूरी तरह टूट चुके थे। वे रोज यमुना किनारे जाकर बैठते, जहाँ कान्हा गायों को चराया करते थे। गोकुल की गऊएँ भी उदास होकर कान्हा का रास्ता निहारती थीं। नंद भवन में जहाँ कभी उत्सवों का माहौल रहता था, वहाँ अब केवल गहरा सन्नाटा और कान्हा के लौटने का इंतज़ार था।
भाग 3: जब उद्धव आए ब्रज (प्रेम और ज्ञान का संवाद)
मथुरा में रहते हुए भी श्रीकृष्ण अपने नंद-यशोदा और ब्रजवासियों को एक क्षण के लिए भी नहीं भूले थे। वे जब भी अकेला महसूस करते, ब्रज की यादों में खो जाते।
श्रीकृष्ण ने अपने परम ज्ञानी मित्र उद्धव को ब्रज भेजने का निर्णय लिया। उद्धव को अपने निर्गुण ब्रह्म और ज्ञान का बहुत अहंकार था। श्रीकृष्ण ने उनसे कहा— "उद्धव! तुम ब्रज जाओ और मेरे माता-पिता तथा गोपियों को ज्ञान का उपदेश देकर उनके शोक को शांत करो।"
जब उद्धव गोकुल पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि पूरा ब्रज केवल 'कृष्ण-कृष्ण' की रट लगा रहा है।
नंद बाबा और यशोदा माता ने उद्धव का वैसा ही सत्कार किया जैसा वे कान्हा के मित्र का करते।
जब उद्धव ने उन्हें निर्गुण ईश्वर और योग साधना का ज्ञान देना शुरू किया, तो माता यशोदा ने कहा— "उद्धव! हम तो सीधे-साधे ब्रजवासी हैं। हमें तुम्हारा यह कठिन ज्ञान समझ नहीं आता। हमारे लिए तो हमारा वही माखनचोर कान्हा ही ईश्वर है।"
उद्धव ने जब गोपियों और नंद-यशोदा के अनन्य, पावन प्रेम को देखा, तो उनका ज्ञान का अहंकार चूर-चूर हो गया। वे समझ गए कि जहाँ निश्छल प्रेम होता है, वहाँ ज्ञान भी नतमस्तक हो जाता है। उद्धव मथुरा लौटकर श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और बोले— "हे प्रभु! मैं ब्रजवासियों को ज्ञान देने गया था, लेकिन उनसे सच्चा प्रेम सीखकर लौटा हूँ।"
भाग 4: कुरुक्षेत्र का महामिलन वर्षों बाद वो पावन क्षण
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| द्वारकाधीश रूप में श्रीकृष्ण, माता यशोदा और नंद बाबा के चरणों में शीश झुकाए हुए या माता यशोदा भावुक होकर श्रीकृष्ण को गले लगाते हुए। |
मथुरा छूटने के दशकों बाद—जब श्रीकृष्ण द्वारका के एक महान और ऐश्वर्यशाली राजा बन चुके थे, और रुक्मिणी तथा अन्य रानियों के साथ द्वारकाधीश कहलाते थे—तब एक अद्भुत अवसर आया।
सूर्य ग्रहण का अवसर
श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कंध) के अनुसार, एक बार कुरुक्षेत्र में एक बहुत बड़ा सूर्य ग्रहण पड़ा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के समय समंतपंचक (कुरुक्षेत्र) के पवित्र कुंडों में स्नान करने का बहुत बड़ा पुण्य माना जाता था।
इस अवसर पर भारतवर्ष के कोने-कोने से राजा-महाराजा, ऋषि-मुनि और सामान्य जन कुरुक्षेत्र पहुँचे।
एक तरफ द्वारका से श्रीकृष्ण, बलराम, वासुदेव, देवकी, रुक्मिणी और पूरा यादुकुल आया।
दूसरी तरफ, जब ब्रजवासियों को पता चला कि कान्हा कुरुक्षेत्र आ रहे हैं, तो नंद बाबा, माता यशोदा, राधा रानी और सभी गोकुलवासी अपने प्रिय कान्हा के दर्शन की आस में बैलगाड़ियों पर सवार होकर कुरुक्षेत्र के लिए निकल पड़े।
वह क्षण जब आँखें बरस पड़ीं
कुरुक्षेत्र के विशाल मैदान में जब ब्रजवासियों के शिविर लगे, तो श्रीकृष्ण स्वयं अपने माता-पिता (नंद और यशोदा) से मिलने उनके तंबू की ओर दौड़े।
जैसे ही माता यशोदा ने श्रीकृष्ण को देखा—जो अब बालक नहीं, बल्कि एक प्रतापी राजा के रूप में खड़े थे—वे अपने अश्रुओं को रोक न सकीं।
यशोदा माता दौड़कर आगे बढ़ीं और श्रीकृष्ण को अपने हृदय से लगा लिया।
वर्षों का बिछोह, वर्षों का दर्द और अनगिनत रातों का इंतज़ार—सब कुछ आंसुओं के रूप में बह निकला।
श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि माता यशोदा के स्तन से वात्सल्य का दूध बहने लगा, जैसे श्रीकृष्ण आज भी उनके वही छोटे से लल्ला हों।
श्रीकृष्ण ने नंद बाबा के चरणों को छुआ और उनसे लिपट गए। द्वारकाधीश श्रीकृष्ण, जिनके सामने बड़े-बड़े राजा सिर झुकाते थे, वे अपने बाबा नंद के सामने एक छोटे बालक की तरह शीश झुकाए खड़े थे। श्रीकृष्ण ने नंद बाबा से कहा— "बाबा! भले ही परिस्थितियों ने मुझे आपसे दूर रखा, लेकिन मेरा हृदय हमेशा ब्रज और आपके चरणों में ही रहा।"
देवकी और यशोदा का मिलन
इस महामिलन में एक और भावुक दृश्य वह था जब माता देवकी और माता यशोदा आमने-सामने आईं।
देवकी जी ने माता यशोदा के हाथ जोड़ लिए और नतमस्तक होकर कहा— "हे बहन! तुमने मेरे पुत्र को जन्म से भी बढ़कर पाला है। वास्तव में तुम ही उसकी सच्ची माँ हो। मेरे पापों या प्रारब्ध के कारण तुम दोनों को यह विरह सहना पड़ा, इसके लिए मुझे क्षमा करना।"
माता यशोदा ने देवकी को गले लगाया और कहा— "देवकी, कान्हा तुम्हारा ही अंश है, पर उसने मुझे जो माँ का सुख दिया, वह तीन लोकों में दुर्लभ है।"
राधा रानी और गोपियों से मिलन
इसी कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण का राधा रानी और ब्रज की गोपियों से भी पुनर्मिलन हुआ। यह मिलन सांसारिक नहीं, बल्कि विशुद्ध आध्यात्मिक था।
गोपियों ने श्रीकृष्ण को राजा के रूप में देखा, लेकिन वे उनके मन में बसे गोकुल वाले नटखट कान्हा को ही ढूँढ रही थीं।
श्रीकृष्ण ने राधा रानी से एकांत में संवाद किया। वहाँ कोई शिकायत नहीं थी, कोई शिकायत का भाव नहीं था—केवल एक मौन स्वीकृति थी कि वे शरीर से भले अलग रहे हों, लेकिन आत्मा से कभी अलग नहीं हुए।
भाग 5: कुरुक्षेत्र के बाद और नित्य गोलोक गमन
कुरुक्षेत्र में कई दिनों तक यह पावन मिलन चला। श्रीकृष्ण ने नंद बाबा और माता यशोदा की हर तरह से सेवा की। लेकिन विधि का विधान यही था कि श्रीकृष्ण को अपने धर्म-संस्थापन के कार्य पूरे करने थे, और ब्रजवासियों को अपनी भक्ति साधना पूरी करनी थी।
जब विदा का समय आया, तो नंद बाबा और माता यशोदा अत्यंत भारी मन से वापस ब्रज लौट आए। लेकिन इस बार उनके दिलों में विरह का दर्द नहीं, बल्कि कान्हा के प्रेम की वह तृप्ति थी जो कुरुक्षेत्र में उन्हें मिली थी। वे समझ चुके थे कि उनका कान्हा कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं साक्षात परमब्रह्म है, जो उनके वात्सल्य भाव को स्वीकार करने धरती पर आया था।
नित्य धाम गमन
पौराणिक आख्यानों और पद्म पुराण के अनुसार:
जब श्रीकृष्ण ने अपनी धरा-लीला (पृथ्वी पर अपनी उपस्थिति) को पूरा किया और अपने परम धाम बैकुंठ/गोलोक प्रस्थान करने का समय आया, तब ब्रज के सभी निवासी—नंद बाबा, माता यशोदा, राधा जी और समस्त गोप-गोपियाँ—श्रीकृष्ण की योगमाया की शक्ति से अपने भौतिक शरीर को छोड़कर सीधे 'नित्य गोलोक धाम' पहुँच गए।
वहाँ आज भी, अनन्त काल तक, माता यशोदा अपने कान्हा को माखन खिलाती हैं, नंद बाबा उसे दुलारते हैं और ब्रज की गलियों में कान्हा की मुरली गूंजती रहती है।
निष्कर्ष: प्रेम, वात्सल्य और समर्पण की अमर गाथा
मथुरा जाने के बाद नंद बाबा और माता यशोदा का जीवन भले ही विरह में बीता, लेकिन उनका यह विरह संसार को यह सिखाने के लिए था कि सच्चा प्रेम दूरी से समाप्त नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है।
देवकी जी ने श्रीकृष्ण को जन्म ज़रूर दिया, लेकिन कान्हा के बाल रूप के सुख, उनकी अठखेलियों और निष्काम वात्सल्य का संपूर्ण आनंद केवल और केवल माता यशोदा और नंद बाबा के भाग्य में ही आया। यही कारण है कि जन्म देने वाली माँ देवकी कहलाईं, पर जगत् का पालनहार सदैव "यशोदा का नंदन" और "नंदलाला" ही कहलाया। सदियाँ बीत जाने के बाद भी, आज भी जब संपूर्ण सृष्टि में जन्माष्टमी या उत्सव का आनंद छाता है, तो गूंज देवकी के महल की नहीं, बल्कि ब्रज के उस पावन प्रांगण की ही सुनाई देती है— "नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!"
पाठकों के लिए एक आध्यात्मिक संदेश:-
"संबंध केवल रक्त से नहीं, बल्कि प्रेम की प्रगाढ़ता और समर्पण से बनते हैं।"
श्रीकृष्ण, यशोदा मैया और नंद बाबा का यह पवित्र चरित्र हमें याद दिलाता है कि यदि आपके प्रेम में निश्छल भाव है, तो दुनिया की कोई दूरी, कोई राजसी वैभव और कोई काल-चक्र उस रिश्ते की गर्माहट को कम नहीं कर सकता।
संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी और द्वारकाधीश होकर भी जब श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र में यशोदा मैया की गोदी में सिर रखते हैं, तो वे पूरी मानवता को यही संदेश देते हैं कि चाहे आप जीवन में सफलता के कितने ही बड़े शिखर या पद पर क्यों न पहुँच जाएं, अपने संस्कारों, अपनी जड़ों और माता-पिता के निस्वार्थ वात्सल्य के आगे हमेशा 'लल्ला' बनकर ही झुकना चाहिए।
कुरुक्षेत्र का यह पावन पुनर्मिलन केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था—यह इस बात का प्रमाण है कि भगवान चाहे कितने भी बड़े राजा क्यों न बन जाएं, अपने भक्त के निष्काम प्रेम के आगे वे हमेशा वही ब्रज के छोटे से 'माखनचोर' ही रहते हैं।
आपको नंद-यशोदा और श्रीकृष्ण के इस पावन संबंध और कुरुक्षेत्र महामिलन की यह कथा कैसी लगी? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें!
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