"पहाड़ में पहाड़ जैसा जीवन"सिर पर बोझा, होठों पर मुस्कान और अदम्य स्वाभिमान
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| अपनी माटी, संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव। |
पहाड़ की नारी संघर्ष, स्वाभिमान और देवभूमि की असली आत्मा
पहाड़ों का नाम सुनते ही आँखों के सामने देवदार और चीड़ के घने जंगल, बादलों को छूती बर्फ़ीली चोटियाँ, कल-कल बहती नदियां और सर्पीली सड़कें तैरने लगती हैं। पर्यटकों के लिए यह किसी हसीन ख्वाब या सुकून देने वाले स्वर्ग जैसा लगता है। लेकिन इस प्राकृतिक सुंदरता के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई यह है कि
"पहाड़ में पहाड़ जैसा
जीवन जीना पड़ता है।"
यहाँ
प्रकृति जितनी उदार है, परिस्थितियाँ
उतनी ही कठोर। ढलानों
पर बसे छोटे-छोटे
गाँव, जहाँ मूलभूत सुविधाओं
के लिए भी हर
दिन एक नया युद्ध
लड़ना पड़ता है। न समतल
खेत हैं, न सीधी
सड़कें और न ही
जीवन की सहजता। यहाँ
न तो भोजन आसानी
से उगता है और
न ही आसानी से
पकता है। पानी के
लिए गहरी खाइयों और
गधेरों तक उतरना पड़ता
है, तो ईंधन के
लिए बीहड़ जंगलों में भटकना पड़ता
है। यहाँ की पथरीली
ज़मीन से अन्न का
एक-एक दाना उगाने
के लिए पसीने की
बूंदें नहीं, बल्कि पूरे जीवन का
निचोड़ सींचना पड़ता है।और इस अति-कठिन,
पथरीले जीवन को अपने
निस्वार्थ कंधों पर उठाकर सहजता
से मुस्कुराने वाली कोई और
नहीं, बल्कि पहाड़ की नारी है।
यदि यह कहा जाए
कि पहाड़ों का अस्तित्व और
वहाँ का जीवन सिर्फ
और सिर्फ वहाँ की स्त्रियों
के दम पर टिके
हैं, तो यह कोई
अतिशयोक्ति नहीं होगी।
पहाड़ों का जीवन और पर्यावरण
जहाँ हर कदम एक चुनौती है
पहाड़ों का
पर्यावरण जितना मनोरम है, उतना ही छलावा भी है। कड़कड़ाती ठंड, जमा देने वाली बर्फीली
हवाएं, मूसलाधार बारिश में ढहते पहाड़ (भूस्खलन) और भीषण गर्मी में तपती ढलानें—इन
सबके बीच पहाड़ी जीवन पनपता है।शहरों की तरह यहाँ स्विच दबाते ही पानी का नल नहीं खुलता,
न ही गैस सिलेंडर सीधे रसोई तक पहुँचता है। यहाँ हर काम शारीरिक परिश्रम और अदम्य इच्छाशक्ति
पर टिका है। खेती के नाम पर सीढ़ीदार (Step Farming) छोटे-छोटे खेत हैं, जहाँ आधुनिक
मशीनें, ट्रैक्टर या भारी उपकरण नहीं पहुँच सकते। हल चलाने से लेकर कटाई तक का सारा
काम हाथों से ही करना पड़ता है। पथरीली मिट्टी से फसल उपजाना प्रकृति से सीधे संघर्ष
करने जैसा है। इसी पर्यावरण के बीच पली-बढ़ी पहाड़ी महिला अपनी क्षमता का दायरा इतना
बढ़ा लेती है कि जीवन की हर विषम परिस्थिति उसके सामने घुटने टेक देती है।
मेरी माँ का एक दिन भोर के
सन्नाटे से रात के सन्नाटे तक
इस कठिन जीवनशैली
को समझने के लिए किसी किताब की ज़रूरत नहीं, मैंने इसे अपनी माँ के जीवन में करीब से
महसूस किया है। उनकी पूरी जिंदगी पहाड़ों के इस निष्ठुर पर खूबसूरत चक्र को ही समर्पित
हो चुकी है। सुबह जब सूरज की पहली किरण भी पहाड़ों की चोटियों को नहीं छू पाती, जब
पूरा गाँव गहरी नींद में सोया होता है, तब मेरी माँ उठ जाती हैं। उनका दिन किसी आराम
या अलार्म से नहीं, बल्कि घर की अनगिनत जिम्मेदारियों की आहट से शुरू होता है।
नौले का ताज़ा पानी और चूल्हे
की पहली चाय

नौले को ठंडो पानी, पहाड़ा की ठंडी हवा
उठते ही माँ का पहला काम होता है गाँव के पारंपरिक 'नौले' (प्रकृति द्वारा निर्मित शुद्ध जल स्रोत) की तरफ बढ़ना। हाथ में पीतल या स्टील की गागर और सिर पर बर्तन का संतुलन बनाए हुए, माँ अलसुबह ढलान उतरकर नौले तक जाती हैं। उस ताज़े, मीठे और शीतल जल से घर के बड़े-बुजुर्गों (दादा-दादी) के लिए सुबह की पहली गरम चाय बनती है। वह ताज़ा जल केवल प्यास नहीं बुझाता, बल्कि पूरे परिवार में एक नई ऊर्जा फूंक देता है।
मवेशी, गोबर और दूध का गणित
चाय के बाद
माँ मवेशियों (गाय-भैंसों) के गोठ (छप्पर) का रुख करती हैं।
- गाय-भैंसों का दूध निकालना और उसे
समय पर स्थानीय डेयरी तक भेजने की व्यवस्था करना।
- पशुओं का गोबर उठाना, उसे टोकरी
(डोका) में भरकर बाहर फेंकना और मवेशियों की जगह को बिल्कुल साफ-सुथरा बनाना।
- गायों को बाहर बाँधकर उन्हें ताज़ा
हरा चारा और पानी देना।
बीहड़ जंगलों की ओर रुख
- घर के प्राथमिक कामों से निपटकर
माँ गाँव की अन्य महिलाओं के साथ जंगलों की तरफ निकल जाती हैं। यह सफर कोई आम
चहलकदमी नहीं होता। घने जंगलों में ऊबड़-खाबड़, पथरीले और खतरनाक रास्तों से गुजरते
हुए वे सूखी लकड़ियाँ, सूखी पत्तियाँ (पिरुल) और मवेशियों के लिए हरा चारा चुनती
हैं। सिर पर लकड़ियों और घास का पचास-साठ किलो का गट्ठर, हाथों में दरांती (काँछी)
और पैरों में खड़ी चढ़ाई का अभ्यास—माँ जब यह गट्ठर लेकर वापस घर लौटती हैं, तो
उनके माथे पर पसीने की बूंदे तो होती हैं, पर आँखों में कोई शिकन नहीं होती।
खेतों का कठोर परिश्रम और ढलती
शाम
घर लौटकर जल्दी-जल्दी
रूखा-सूखा खाना खाकर माँ सीधे खेतों की ओर निकल जाती हैं। कभी-कभी तो काम इतना ज्यादा
होता है कि दोपहर का खाना भी खेतों में ही माँ के लिए पहुँचाया जाता है। चाहे कड़कड़ाती
जेठ की धूप हो या सावन की मूसलाधार बारिश, खेतों में गुड़ाई, निराई या रोपाई का काम
कभी रुकता नहीं।
शाम को थककर
चूर होकर जब माँ घर लौटती हैं, तो आराम का समय तब भी नहीं होता। फिर से वही चूल्हा-चौका,
रात का खाना बनाना, पूरे परिवार और बच्चों को प्रेम से खिलाना, बर्तन माँजना, रसोई
साफ करना और अंत में जब आधी रात होने को आती है, तब माँ अपनी थकी हुई देह को बिस्तर
पर टिकाती हैं। और अगली सुबह... फिर वही चक्र बिना किसी बदलाव के दोहराया जाता है।
बिना किसी शिकायत के अदम्य
स्वास्थ्य और चमत्कारिक सहनशक्ति
आज के दौर में
जहाँ शहरों में हल्की सी अस्वस्थता, सिरदर्द या गर्भावस्था में हफ़्तों के बेड-रेस्ट
की सलाह दी जाती है, वहीं मेरी माँ और पहाड़ों की अन्य महिलाओं की कहानी किसी चमत्कार
से कम नहीं लगती।
हम चार भाई-बहन
हैं। हम चारों का जन्म किसी आधुनिक अस्पताल में नहीं, बल्कि गाँव की पुरानी दाई की
देखरेख में हमारे घर पर ही हुआ था। माँ ने गर्भावस्था (Pregnancy) के नौवें महीने तक
वही कठिन काम किए—सिर पर घास का गट्ठर लाना, भारी गागर में पानी ढोना, और खेतों में
काम करना। अद्भुत बात यह है कि इतनी कठिन परिस्थितियों और बिना किसी फैंसी मेडिकल केयर
के घर में डिलीवरी होने के बाद भी, माँ आज भी पूरी तरह स्वस्थ, फिट, स्लिम और ऊर्जावान
हैं। आज भी वे उसी जोश से काम करती हैं।
इसके पीछे का वैज्ञानिक व व्यावहारिक
सच
पहाड़ों की
महिलाओं का दैनिक जीवन ही उनका सबसे बड़ा व्यायाम (Workout) है।
मजबूत पेल्विक
मांसपेशियां: सिर पर भारी वजन लेकर खड़ी चढ़ाइयों पर चढ़ने और उतरने से उनके पेल्विक
हिस्से और कोर मसल्स स्वाभाविक रूप से इतनी मजबूत और लचीली हो जाती हैं कि प्रसव
(Delivery) जैसी कठिन प्रक्रिया भी उनके लिए प्राकृतिक रूप से आसान हो जाती है। शुद्ध
आबो-हवा और खान-पान: नौले का मिनरल-रिच ताज़ा पानी, जैविक (Organic) खाना, मंडुआ, झंगोरा
और ताज़ी हरी सब्जियां उनके शरीर को अंदर से इतना लोहे जैसा बना देती हैं कि कोई बड़ी
बीमारी उनके पास फटकती तक नहीं।
मानसिक सुदृढ़ता:
उनके अंदर दर्द सहने की क्षमता (Pain Threshold) असाधारण होती है। वे अपनी शारीरिक
तकलीफों का ढिंढोरा पीटने के बजाय उन्हें हँसते-हँसाते सहना जानती हैं।
'पड़्या' और 'हथबाटा': पहाड़ों
का अनूठा सामाजिक ताना-बाना
पहाड़ का जीवन जितना व्यक्तिगत रूप से कठिन है, सामाजिक रूप से उतना ही जुड़ा हुआ है। काम कितना भी भारी क्यों न हो, पहाड़ों की नारियाँ उसका बोझ अकेले नहीं ढोतीं। हमारे यहाँ सदियों से एक बहुत सुंदर और वैज्ञानिक व्यवस्था चली आ रही है, जिसे स्थानीय भाषा में 'पड़्या', 'हथबाटा' या 'पैंच' (आपसी सहयोग की परंपरा) कहा जाता है।
उदाहरण के लिए,
अगर आज किसी एक परिवार के दूर-दराज के खेतों में गोबर की खाद डालनी है, तो गाँव की
सभी औरतें सुबह-सुबह उसी एक घर के आँगन में इकट्ठा हो जाएँगी।
- सभी महिलाएँ अपने-अपने सिर पर गोबर
से भरी टोकरियाँ (डोका) रखती हैं।
- दूर खेतों तक ऊबड़-खाबड़ रास्तों
पर एक कतार में चलती हैं।
- रास्ते भर आपस में घर-परिवार की
बातें, सुख-दुख के किस्से और पारंपरिक लोकगीत गूँजते रहते हैं।
हँसते-हँसाते,
मजाक करते-करते घंटों का भारी काम महज दो-तीन घंटों में खत्म हो जाता है। अगले दिन
यही पूरी टोली किसी दूसरी महिला के खेत का काम निपटाने निकल पड़ती है। यह केवल काम
निपटाने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह उनका अपना अनूठा 'गेट-टुगेदर'
(Get-Together) और स्ट्रेस-बस्टर (तनाव दूर करने का जरिया) होता है, जहाँ वे दिन भर
की थकान को अपनी बातों और ठहाकों में उड़ा देती हैं।
शहर की तन्हाई बनाम गाँव की
निश्छल आत्मीयता
आज के आधुनिक
शहरों में बहुमंजिला इमारतों (Apartments) में रहने वाले लोगों को यह तक मालूम नहीं
होता कि उनके सामने वाले फ्लैट में कौन रह रहा है, कौन बीमार है या कौन किस हाल में
है। शहर की दौड़-भाग ने इंसान को सुविधाएँ तो दीं, लेकिन अपनों का साथ छीन लिया।
इसके ठीक उलट,
हमारे पहाड़ों में आज भी वही सदियों पुरानी एकता, प्रेम और निश्छल भाईचारा ज़िंदा है:
दुख-सुख
का साझा विस्तार: गाँव
में अगर किसी एक घर में कोई विपदा आ जाए या शादी-ब्याह जैसा कोई शुभ काम हो, तो पूरे
गाँव को न्योता देने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पूरा गाँव अपने-आप काम बाँट लेता है। पुरुष
लकड़ियाँ काटने और व्यवस्था संभालने निकल पड़ते हैं, तो महिलाएँ घर की लिपाई-पुताई,
खाना बनाने और सजावट के कामों में जुट जाती हैं।
बड़ों की
चौपाल और साँझा भोजन:
आज भी गाँव के बड़े-बुजुर्ग दोपहर में किसी के आँगन या पीपल की छँव में बैठते हैं।
तंबाकू की चिलम या चाय की चुस्कियों के साथ गाँव-जहान की बातें होती हैं। किसी के घर
में कोई विशेष पकवान बने, तो वह जब तक पड़ोस के बच्चों तक न पहुँचे, खाना अधूरा माना
जाता है। यहाँ कोई अकेला नहीं है। यहाँ हर दुख बाँटने से आधा हो जाता है और हर खुशी
साझी होने से दोगुनी हो जाती है।
निष्कर्ष: आधुनिकता का छलावा और मेरी माँ की सादगी
आज मैं शादी के बाद शहर की आधुनिक चमक-धमक में आ गई हूँ। यहाँ जिंदगी आसान है—बटन दबाते ही पानी आता है, फोन के एक क्लिक पर राशन और हर सामान घर के दरवाजे पर पहुँच जाता है। शहर ने हमें तमाम सुविधाएँ तो दे दीं, लेकिन बदले में हमसे हमारी शांति छीन ली।
यहाँ दूध में मिलावट है, हवा में ज़हर है, और सबसे दुखद बात यह है कि इंसानों के व्यवहार में भी मिलावट आ चुकी है। यहाँ सब कुछ होने के बावजूद वह गहरी नींद, वह आत्मीयता और मन का वह सुकून गायब है, जो मुझे मेरे गाँव के आँगन में माँ की गोद में मिलता था।
मेरी माँ आज भी गाँव में उसी सादगी और निश्छल जीवनशैली में जी रही हैं। वे शहर की सुविधाओं के पीछे भागने के बजाय अपनी मिट्टी, अपने खेतों और अपने नौले के ताज़े पानी के साथ खुश हैं। आज मुझे अहसास होता है कि असली समृद्धि शहर के कंक्रीट के जंगलों में नहीं, बल्कि गाँव की उस शुद्ध आबो-हवा और अपनों के साथ में है।
पहाड़ की सुंदरता केवल उसकी बर्फ़ीली चोटियों, नदियों, या पगडंडियों में नहीं है। पहाड़ों की असली सुंदरता और आत्मा यहाँ की महिलाओं के स्वाभिमान, त्याग और उनके अटूट साहस में बसती है। वे कोई महान बनने के लिए यह काम नहीं करतीं, न ही वे किसी से दया या सहानुभूति की भीख माँगती हैं। उनका पसीना ही उनका स्वाभिमान है और उनका परिवार ही उनका संसार। यदि किसी दिन पहाड़ों से इन स्त्रियों के निस्वार्थ परिश्रम को हटा दिया जाए, तो पहाड़ों का जीवन उसी क्षण ठप हो जाएगा।मेरी माँ और गाँव की हर उस कर्मठ, साहसी और स्वाभिमानी नारी को मेरा शत-शत नमन, जो बिना किसी शिकायत के, होठों पर मंद मुस्कान लिए, इस कठिन जीवन को हर रोज एक उत्सव की तरह जी रही हैं।
🌸लेखिका का संदेश
"दोस्तों, विकास और अवसरों की तलाश में शहर आना गलत नहीं है, लेकिन अपनी जड़ों को भूल जाना अपनी आत्मा को खो देने जैसा है। गाँव सिर्फ एक जगह नहीं, हमारी पहचान है।
आज जब हम शहरों के शोर-शराबे और मिलावटी जीवन में थक जाते हैं, तो याद रखिए कि गाँव में आज भी कोई हमारी राह देख रहा है—वही शुद्ध हवा, वही निश्छल रिश्ते और माँ का बेपनाह प्यार। समय निकालकर अपने गाँव ज़रूर जाइए, अपनी माटी को माथे से लगाइए और अपनी जड़ों से जुड़े रहिए। क्योंकि पेड़ चाहे जितना भी ऊँचा उठ जाए, अगर जड़ से कट गया तो उसका वजूद खत्म हो जाता है।"
💬 आपकी क्या राय है?
क्या आप भी शहर की इस भागदौड़ में अपने गाँव और माँ के आँगन के सुकून को याद करते हैं? अपने अनुभव और गाँव की यादें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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