कर्म का अचूक चक्र जब भगवान भी न बच सके अपने कर्मों के फल से
कर्म का अचूक विधान जब ईश्वर और महामानव भी न बच सके अपने कर्मों के फल से प्रकृति कर्मप्रधान है" — यह भारतीय दर्शन और सनातन जीवन-शैली का सबसे बड़ा सत्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा॥ क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम बिना सोचे-समझे कोई छोटा-सा काम करते हैं, तो उसका असर कहाँ तक जाता है? ब्रह्मांड का एक सबसे बड़ा और अटूट नियम है— 'लॉ ऑफ कर्म' (Law of Karma) । हम जैसा बीज बोते हैं, वैसी ही फसल काटते हैं। कर्म कोई सजा या पुरस्कार नहीं है, बल्कि यह प्रकृति का केवल एक दर्पण है जो हमारे हर एक्शन का रिएक्शन हमें वापस लौटाता है। कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता: कर्म चाहे अज्ञानता में किया गया...