शत्रुता से परे धर्म जब रावण बना राम जी का पंडित क्यों भगवान राम के यज्ञ के पुरोहित बने रावण?
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस शत्रु का वध करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने पूरी वानर सेना एकत्र की, जिस लंकापति रावण ने माता सीता का हरण किया... उसी रावण के सामने भगवान राम हाथ जोड़कर यजमान बनकर क्यों बैठे थे?
यह रामायण का वह अनकहा और अद्भुत प्रसंग है, जो यह साबित करता है कि सनातन परंपरा में कर्तव्य, ज्ञान और धर्म की मर्यादा शत्रुता से भी कहीं ऊपर होती है। जब युद्ध का मैदान सज चुका था और दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं, तब रामेश्वरम के तट पर एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने शत्रु और मित्र के अंतर को ही मिटा दिया।
रामायण में भक्ति, शक्ति और मर्यादा के कई अद्भुत प्रसंग मिलते हैं। लेकिन इनमें से सबसे अनूठा और हैरान कर देने वाला प्रसंग वह है, जब युद्ध के मैदान में आमने-सामने खड़े दो परम शत्रु—भगवान श्री राम और लंकापति रावण—एक गुरु और यजमान के पवित्र संबंध में बंध गए थे।
आइए जानते हैं त्रेतायुग की वह ऐतिहासिक घटना, जब एक राजा के रूप में शत्रु होने के बावजूद, रावण ने एक सच्चे पंडित का धर्म निभाते हुए भगवान श्री राम के यज्ञ का पुरोहित बनना स्वीकार किया।
योग्य पुरोहित की खोज और रावण का चुनाव:
रावण भले ही अपनी काम वासना और अहंकार के कारण महापापी कहलाया, लेकिन वह चारों वेदों का प्रकांड विद्वान, महाज्ञानी और भगवान शिव का परम भक्त भी था।
जब श्री राम लंका पर आक्रमण करने के लिए तैयार थे, तब उन्होंने समुद्र पार करने और युद्ध में सफलता के लिए शिवलिंग स्थापना (रामेश्वरम) का संकल्प लिया। शास्त्रों के अनुसार, इतने बड़े अनुष्ठान और महायज्ञ को निष्फल होने से बचाने के लिए एक अत्यंत योग्य, वेदपाठी और श्रेष्ठ विद्वान ब्राह्मण की आवश्यकता थी।उस काल में रावण से बड़ा कोई ज्ञानी या शिवभक्त पंडित नहीं था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने बिना किसी हिचकिचाहट के जामवंत जी के माध्यम से लंकापति रावण को यज्ञ के मुख्य पुरोहित बनने का निमंत्रण (पत्र) भिजवाया।

पुरोहित धर्म का पालन रावण का रामेश्वरम आगमन:
जब जामवंत जी ने रावण के दरबार में जाकर श्री राम का निमंत्रण पत्र सौंपा, तो रावण मुस्कुराया। एक राजा के रूप में रावण राम का शत्रु था, लेकिन एक पंडित के रूप में उसने अपने पुरोहित धर्म को सर्वोपरि माना। रावण ने कहा— "यज्ञ के लिए जब भी कोई यजमान किसी ब्राह्मण को याद करता है, तो आमंत्रण स्वीकार करना ब्राह्मण का कर्तव्य है।"
शास्त्रों के अनुसार, किसी भी धार्मिक यज्ञ में पत्नी का यजमान के साथ बैठना अनिवार्य होता है। उस समय माता सीता रावण की अशोक वाटिका में थीं। रावण जानता था कि बिना सीता के यह यज्ञ अधूरा रहेगा, इसलिए वह एक सच्चे पंडित का धर्म निभाते हुए माता सीता को भी अपने साथ रामेश्वरम तट पर लेकर आया।
यज्ञ की समाप्ति और 'विजई भव' का अमर आशीर्वाद:
रावण ने पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना और महायज्ञ संपन्न कराया। यज्ञ के समाप्त होने पर यजमान (श्री राम) को अपने पुरोहित (रावण) को दक्षिणा देनी थी।
श्री राम ने हाथ जोड़कर रावण से पूछा— "हे महाज्ञानी पुरोहित! इस यज्ञ की दक्षिणा में आप क्या चाहते हैं?"
रावण ने कहा— "एक राजा के रूप में मेरी दक्षिणा यह होगी कि जब युद्ध समाप्त हो और मेरा अंतिम समय आए, तब तुम मेरे सामने खड़े रहना ताकि मुझे तुम्हारे दिव्य रूप के दर्शन हों।"
इसके बाद परंपरा के अनुसार जब श्री राम ने पुरोहित रावण के चरण छूकर आशीर्वाद माँगा, तो रावण धर्म संकट में पड़ गया। लेकिन एक पंडित के रूप में वह अपने यजमान को झूठा या अधूरा आशीर्वाद नहीं दे सकता था। रावण ने बड़े भारी हृदय किंतु सच्चे मन से अपने ही शत्रु श्री राम के सिर पर हाथ रखकर कहा— "विजई भव!" (आपकी विजय हो!)।
इस कथा की प्रामाणिकता:-
यह सुंदर प्रसंग महर्षि वाल्मीकि की मूल संस्कृत रामायण में नहीं मिलता, बल्कि दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कंब रामायण (तमिल रामायण), कई लोककथाओं और रामलीलाओं में प्रमुखता से दर्शाया जाता है। यह कथा दिखाती है कि सनातन संस्कृति में कर्तव्य, ज्ञान और मर्यादा का स्थान शत्रुता से भी ऊपर रखा गया है।
अंत में मैं अपने सभी पाठकों से यही कहना चाहूंगी कि यह कथा हमें सिखाती है कि इंसान के भीतर कमियां और अच्छाइयां दोनों हो सकती हैं। रावण में अहंकार था, लेकिन उसने अपने ज्ञान और पंडित धर्म की मर्यादा को कभी नहीं टूटने दिया। वहीं भगवान श्री राम ने अपने शत्रु के ज्ञान का सम्मान करके हमें सिखाया कि गुण चाहे शत्रु में भी हो, उसका आदर करना ही सच्ची महानता है।
**यह कथा हमें सिखाती है कि इंसान अपने विचारों से बड़ा होता है, अपनी नफ़रत से नहीं।**
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